सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

चौथ के चंद्रमा का मन भी ललचता है


चौथ के चंद्रमा का मन भी ललचता है
रूप मे जो तेरे आज एक नूर बरसता है।

छननी का परदा आज दरमियाँ जो है
वे परदा तुझे देखने चांद भी तरसता है।

हैरान है आकाश देख के धरा पे रोशनी
माथे पे सुहाग का टीका जो दमकता है।

कानों मे आकर रस घोल जाती है पवन
कलाईयों पे तेरे कंगना जो खनकता है।

शायद तेरे ही श्रृंगार से ईर्ष्या है चांद को
तभी तुझे चिढ़ाने वो देर से निकलता है।

तेरे कठिन व्रत के आगे झुकती कायनात
सत्य सावित्री से तो यम भी लरजता है। (लरजना =भयभीत होना )

सुरेश राय 'सरल'

(चित्र गूगल से साभार )

9 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. हार्दिक आभार आपका जो आपने इस रचना को आशीष दिया ।सादर

      हटाएं
    2. आदरणीय संगीता जी , मैंने दोहा के नियमों को जान एक कौशिश की है। सुधार सुझाव की चेस्ठा है।

      करवा चौथ के व्रत मे,
      सुहागिन करे आस

      पति को दीर्घायू मिले,
      ऐसा है विश्वास

      सुरेS

      हटाएं
  2. हैरान है आकाश देख के धरा पे रोशनी
    माथे पे सुहाग का टीका जो दमकता है ..

    बहुत ही भाव प्रधान शेर हैं सभी .... सभी को आज का दिन मुबारक ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय नासवा जी , आपकी टिप्पणी से मैं ऊर्जान्वित हो जाता हूँ । हार्दिक आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आदरणीय शर्माजी हार्दिक धन्यवाद आपके आशीर्वचनो के लिए

      हटाएं
  5. bahut sundar ..
    mere blog par bhi aap sabhi ka swagat hai..
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं